नागालैंड
के दीमापुर में हजारों की भीड़ ने सैय्यद फरीद को जेल में पुलिस की
सुरक्षा से बाहर खींच कर निकाला। 7-8 किलोमीटर तक उसे घसीटते-पीटते रही और
उसकी मौत हो जाने के बाद उसे फांसी पर लटका दिया गया। न्याय व महिला
सुरक्षा के नाम पर। यह कहते हुए उसे मार डाला गया कि सैय्यद फरीद
बांग्लादेशी मुसलमान है। यह पूरी घटना पुलिस के सामने हुई और पुलिस ने उसकी
सुरक्षा के लिए कुछ भी नहीं किया। प्रशासन ने अपने पैर नहीं हिलाये।
इसे भीड़ का सामान्य गुस्सा नहीं कहा जा सकता। न ही इसे एक सामान्य दुश्मनी, मार-पीट या बलात्कार की घटना के अपराधी पर भीड़ के गुस्से के रूप में लिया जा सकता है।
इसमें अभी तक जितने भी कोणों से बयान आये हैं, वे यही बताते हैं कि सैय्यद फरीद को मारने के लिए भीड़ को उकसाकर लाया गया था। यह पूरी योजनाबद्धता व तैयारी के साथ हुआ।
अभी हाल के इसके कुछ उदाहरण मौजूद हैं जिनमें छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार हुए हैं लेकिन इस हद तक जनता का उन्माद व आक्रामकता देखने को नहीं मिली।
कोई दिन ऐसा नहीं जाता है जब देश में बलात्कार की कोई घटना न हुई हो लेकिन भीड़ को गुस्सा नहीं आता। भीड़ को तब भी गुस्सा नहीं आता जब लड़कियों के साथ गैंग रेप होते हैं। उसे तब भी गुस्सा नहीं आता जब घर परिवार के सदस्य या पड़ौसी द्वारा महिलाओं व छोटी बच्चियों से बलात्कार किया जाता है। फैक्टरियों में मालिकों द्वारा सुरक्षा इंतजामों में लापरवाही के कारण रोज दुर्घटनायें होती हैं लेकिन किसी को गुस्सा नहीं आता।
इस भीड़ को गुस्सा तब ही आता है जब कोई मुस्लिम आदमी इन घटनाओं में शामिल हो।
उत्तराखण्ड के नैनीताल जिले में कशिश, महिमा सेठ व प्रीति के बलात्कार व हत्या के बाद भीड़ को गुस्सा नहीं आया। दिल्ली में 16 दिसम्बर, 2012 के बाद लगातार लगभग महिने भर तक लड़कियों के साथ बलात्कार की खबरें आयीं लेकिन भीड़ को गुस्सा नहीं आया। गुवाहाटी में 100-150 लोगों की भीड़ जब दिन के उजाले में 15-16 साल की लड़की के साथ घंटे भर तक बदतमीजी व छेड़छाड़ करती रही तब भी किसी को गुस्सा नहीं आया। मारुती के 147 मजदूर बिना किसी अपराध व दोष सिद्धि के लगभग ढाई साल से जेल में बंद हैं। उन्हें जमानत तक नहीं मिल रही है। उनके परिजनों की मौत तक पर उन्हें पैरोल पर भी नहीं छोड़ा जा रहा है लेकिन भीड़ को गुस्सा नहीं आता।
भीड़ को गुस्सा तब ही आता है जब लालकुंआ (उत्तराखण्ड) में 17 साल का एक मुस्लिम लड़का और 16 साल की लड़की प्रेम में पड़कर आपसी सहमति से कहीं चले जाते हैं। जब हल्द्वानी (उत्तराखण्ड) में 7 वर्षीय बच्ची कशिश की बलात्कार व हत्या के मामले में एक मुस्लिम आॅटो वाले का नाम सामने आता है।
क्या यह भीड़ का सामान्य गुस्सा है या पक्षपातपूर्ण गुस्सा है। इस एक घटना ने कई सारे सवाल एक साथ खड़े कर दिये।
सबसे पहले यह कि यदि दो-तीन घंटे तक भीड़ उसे पीटते हुए 6-7 किलोमीटर तक ले गई तो इन दो-तीन घंटे में पुलिस ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? दूसरे क्या एक शख्स को केवल इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह बलात्कार का आरोपी था? दीमापुर, नागालैण्ड में जहां यह घटना हुई वहां सुरक्षा बल विशेष अधिकार कानून (AFSPA- आफस्पा) लगा हुआ है। जिसके तहत भारतीय पुलिस व सेना वहां कुछ भी करने को स्वतंत्र है। ऐसे राज्यों की निगरानी केन्द्र सरकार द्वारा की जाती है। भीड़ को यह किसने बताया कि इतने सारे अपराधियों में से यही व्यक्ति आरोपी सैय्यद फरीद है? क्या बलात्कार के सभी आरोपियों के लिए यही भीड़ यही सजा तय करेगी? क्या ऐसा करने से समाज में अपराध और यौन अपराध खत्म हो जायेंगे? क्या किसी व्यक्ति को बिना किसी अपराध साबित हुए इसलिए फांसी पर चढ़ा देना चाहिए क्योंकि वह मुस्लिम है या विदेशी है, जैसा अफजल गुरू को प्रशासन ने और सैय्यद फरीद को भीड़ ने मार डाला? क्या यह भीड़ अपने आप आई थी या इस उन्मादी भीड़ को उसी तरह भड़का कर लाया गया था जैसे बाबरी मस्जिद को शहीद करने के समय, लालकुंआ (नैनीताल) या फिर त्रिलोकपुरी दंगों के समय संघियों द्वारा अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए साम्प्रदायिकता तनाव व दंगे कराने के लिए लाया गया था। क्या मारुति, ग्रेजियानो, श्रीराम पिस्टन, निप्पन फैक्टरी या किसी भी अन्य फैक्टरी के मजदूरों को भी यह हक है कि वे गुस्से में अपना शोषण-उत्पीड़न कर खून चूसने वालों को पीट-पीट कर मार डालें और पुलिस व प्रशासन मूक दर्शक बना रहे।
भीड़ द्वारा मारे गये व्यक्ति के बारे में यह प्रचारित किया गया था कि वह अवैध बांग्लादेशी था और मुसलमान भी। बाद में जब यह बात सामने आयी कि भीड़ द्वारा मार डाला गया व्यक्ति भारतीय था तो नागा काउंसिल ने यह बयान जारी किया कि 50-50 रुपये देकर कोई भी भारतीय नागरिक बन जाता है इसके साथ ही लड़की की डाॅक्टरी जांच में बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई।
नागा काउंसिल द्वारा दिया गया यह बयान कि 50-50 रुपये खर्च करने पर भारतीय नागरिकता मिल जाती है तो क्या 50 रुपये खर्च करके नागरिकता प्राप्त करने वाला व्यक्ति भारतीय सेना में भी भर्ती हो सकता है?
इस तरह से साफ है कि भीड़ को कुत्सा व उन्मादी प्रचार करके, विषवमन करके लाया गया था। इस सारी घटना के मूल में आमतौर पर मुसलमानों और पूर्वोत्तर के विशेष संदर्भों में बांग्लादेशी नागरिकों की अवैध घुसपैठ के नाम पर किया गया फर्जी उन्मादी प्रचार है।
गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव से पहले नरेन्द्र मोदी ने भी पूर्वोत्तर में अपनी चुनावी सभा में तथाकथित बांग्लादेशी मुसलमानों के सवाल पर वही भड़काऊ भाषण दिया था। महज 1000 या 1500 लोगों की भीड़ इस हत्याकांड की गुनहगार नहीं है। इसकी गुनहगार नस्लीय-धार्मिक व अन्य प्रकार की नफरत फैलाकर सत्ता प्राप्त करने वाली राजनीतिक पार्टियां व इस सबको वैधता व मान्यता देने वाला राजनीतिक तंत्र है।
इसे भीड़ का सामान्य गुस्सा नहीं कहा जा सकता। न ही इसे एक सामान्य दुश्मनी, मार-पीट या बलात्कार की घटना के अपराधी पर भीड़ के गुस्से के रूप में लिया जा सकता है।
इसमें अभी तक जितने भी कोणों से बयान आये हैं, वे यही बताते हैं कि सैय्यद फरीद को मारने के लिए भीड़ को उकसाकर लाया गया था। यह पूरी योजनाबद्धता व तैयारी के साथ हुआ।
अभी हाल के इसके कुछ उदाहरण मौजूद हैं जिनमें छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार हुए हैं लेकिन इस हद तक जनता का उन्माद व आक्रामकता देखने को नहीं मिली।
कोई दिन ऐसा नहीं जाता है जब देश में बलात्कार की कोई घटना न हुई हो लेकिन भीड़ को गुस्सा नहीं आता। भीड़ को तब भी गुस्सा नहीं आता जब लड़कियों के साथ गैंग रेप होते हैं। उसे तब भी गुस्सा नहीं आता जब घर परिवार के सदस्य या पड़ौसी द्वारा महिलाओं व छोटी बच्चियों से बलात्कार किया जाता है। फैक्टरियों में मालिकों द्वारा सुरक्षा इंतजामों में लापरवाही के कारण रोज दुर्घटनायें होती हैं लेकिन किसी को गुस्सा नहीं आता।
इस भीड़ को गुस्सा तब ही आता है जब कोई मुस्लिम आदमी इन घटनाओं में शामिल हो।
उत्तराखण्ड के नैनीताल जिले में कशिश, महिमा सेठ व प्रीति के बलात्कार व हत्या के बाद भीड़ को गुस्सा नहीं आया। दिल्ली में 16 दिसम्बर, 2012 के बाद लगातार लगभग महिने भर तक लड़कियों के साथ बलात्कार की खबरें आयीं लेकिन भीड़ को गुस्सा नहीं आया। गुवाहाटी में 100-150 लोगों की भीड़ जब दिन के उजाले में 15-16 साल की लड़की के साथ घंटे भर तक बदतमीजी व छेड़छाड़ करती रही तब भी किसी को गुस्सा नहीं आया। मारुती के 147 मजदूर बिना किसी अपराध व दोष सिद्धि के लगभग ढाई साल से जेल में बंद हैं। उन्हें जमानत तक नहीं मिल रही है। उनके परिजनों की मौत तक पर उन्हें पैरोल पर भी नहीं छोड़ा जा रहा है लेकिन भीड़ को गुस्सा नहीं आता।
भीड़ को गुस्सा तब ही आता है जब लालकुंआ (उत्तराखण्ड) में 17 साल का एक मुस्लिम लड़का और 16 साल की लड़की प्रेम में पड़कर आपसी सहमति से कहीं चले जाते हैं। जब हल्द्वानी (उत्तराखण्ड) में 7 वर्षीय बच्ची कशिश की बलात्कार व हत्या के मामले में एक मुस्लिम आॅटो वाले का नाम सामने आता है।
क्या यह भीड़ का सामान्य गुस्सा है या पक्षपातपूर्ण गुस्सा है। इस एक घटना ने कई सारे सवाल एक साथ खड़े कर दिये।
सबसे पहले यह कि यदि दो-तीन घंटे तक भीड़ उसे पीटते हुए 6-7 किलोमीटर तक ले गई तो इन दो-तीन घंटे में पुलिस ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? दूसरे क्या एक शख्स को केवल इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह बलात्कार का आरोपी था? दीमापुर, नागालैण्ड में जहां यह घटना हुई वहां सुरक्षा बल विशेष अधिकार कानून (AFSPA- आफस्पा) लगा हुआ है। जिसके तहत भारतीय पुलिस व सेना वहां कुछ भी करने को स्वतंत्र है। ऐसे राज्यों की निगरानी केन्द्र सरकार द्वारा की जाती है। भीड़ को यह किसने बताया कि इतने सारे अपराधियों में से यही व्यक्ति आरोपी सैय्यद फरीद है? क्या बलात्कार के सभी आरोपियों के लिए यही भीड़ यही सजा तय करेगी? क्या ऐसा करने से समाज में अपराध और यौन अपराध खत्म हो जायेंगे? क्या किसी व्यक्ति को बिना किसी अपराध साबित हुए इसलिए फांसी पर चढ़ा देना चाहिए क्योंकि वह मुस्लिम है या विदेशी है, जैसा अफजल गुरू को प्रशासन ने और सैय्यद फरीद को भीड़ ने मार डाला? क्या यह भीड़ अपने आप आई थी या इस उन्मादी भीड़ को उसी तरह भड़का कर लाया गया था जैसे बाबरी मस्जिद को शहीद करने के समय, लालकुंआ (नैनीताल) या फिर त्रिलोकपुरी दंगों के समय संघियों द्वारा अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए साम्प्रदायिकता तनाव व दंगे कराने के लिए लाया गया था। क्या मारुति, ग्रेजियानो, श्रीराम पिस्टन, निप्पन फैक्टरी या किसी भी अन्य फैक्टरी के मजदूरों को भी यह हक है कि वे गुस्से में अपना शोषण-उत्पीड़न कर खून चूसने वालों को पीट-पीट कर मार डालें और पुलिस व प्रशासन मूक दर्शक बना रहे।
भीड़ द्वारा मारे गये व्यक्ति के बारे में यह प्रचारित किया गया था कि वह अवैध बांग्लादेशी था और मुसलमान भी। बाद में जब यह बात सामने आयी कि भीड़ द्वारा मार डाला गया व्यक्ति भारतीय था तो नागा काउंसिल ने यह बयान जारी किया कि 50-50 रुपये देकर कोई भी भारतीय नागरिक बन जाता है इसके साथ ही लड़की की डाॅक्टरी जांच में बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई।
नागा काउंसिल द्वारा दिया गया यह बयान कि 50-50 रुपये खर्च करने पर भारतीय नागरिकता मिल जाती है तो क्या 50 रुपये खर्च करके नागरिकता प्राप्त करने वाला व्यक्ति भारतीय सेना में भी भर्ती हो सकता है?
इस तरह से साफ है कि भीड़ को कुत्सा व उन्मादी प्रचार करके, विषवमन करके लाया गया था। इस सारी घटना के मूल में आमतौर पर मुसलमानों और पूर्वोत्तर के विशेष संदर्भों में बांग्लादेशी नागरिकों की अवैध घुसपैठ के नाम पर किया गया फर्जी उन्मादी प्रचार है।
गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव से पहले नरेन्द्र मोदी ने भी पूर्वोत्तर में अपनी चुनावी सभा में तथाकथित बांग्लादेशी मुसलमानों के सवाल पर वही भड़काऊ भाषण दिया था। महज 1000 या 1500 लोगों की भीड़ इस हत्याकांड की गुनहगार नहीं है। इसकी गुनहगार नस्लीय-धार्मिक व अन्य प्रकार की नफरत फैलाकर सत्ता प्राप्त करने वाली राजनीतिक पार्टियां व इस सबको वैधता व मान्यता देने वाला राजनीतिक तंत्र है।
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