बचपन का घर
कितने खुशनसीब वो पल होते ,
जिसमें तुम्हें हम देख पाते
पलकों से रोकते हैं आसुंओं को किस तरह से
काश तुम देख पाते,
तुमने तो खाई है कसम , न सूरत दिखाओगे
पर जिस घर में तुम रहते हो, उस घर को ही
काश हम देख पाते,
तेरे शहर, घर की तरफ जाती हुयी सड़क को देख कर
कदम खुद - ब - खुद ठिठक जाते हैं
जैसे न आने की कोई कसम,
इन कदमों को तुमने दी है,
खुश होऊं या रोऊँ की तेरे शहर में आकर
तुमको ही नज़र भर न देख पाते हैं
तेरी खैर-ओ-खबर भी कोई नहीं देने वाला हमको
कि तुम तक पहुँचने वाली हर राह को तुमने मोड़ा है,
कभी सोचती हूँ न मिले कोई घर पर तो क्या
जिस घर में रहे हो तुम, उस घर की दर-ओ-दीवारों से मिलकर
तुम्हारी खैर-ओ-खबर पूछ लूं
अगर तेरे बचपन की तरह वो, मेरा भी घर होता
तो मुझ पर घर न आने की, कोई पाबन्दी नहीं होती
हेमलता