Monday, September 19, 2011

बचपन का घर

 बचपन का  घर 

कितने खुशनसीब वो पल होते ,
जिसमें तुम्हें हम देख पाते
पलकों से रोकते हैं आसुंओं को किस तरह से 
काश तुम देख पाते,

तुमने तो खाई है कसम , न सूरत दिखाओगे
पर जिस घर में तुम रहते हो, उस घर को ही 
काश हम देख पाते,

तेरे शहर, घर की तरफ जाती हुयी सड़क को देख कर 
कदम खुद - ब - खुद ठिठक जाते हैं 
जैसे न आने की कोई कसम, 
इन कदमों को तुमने दी है,

खुश होऊं या रोऊँ की तेरे शहर में आकर 
तुमको ही नज़र भर न देख पाते हैं 
तेरी खैर-ओ-खबर भी कोई नहीं देने वाला हमको 
कि  तुम तक पहुँचने वाली हर राह को तुमने मोड़ा है,

कभी सोचती हूँ न मिले कोई घर पर तो क्या 
जिस घर में रहे हो तुम, उस घर की दर-ओ-दीवारों से  मिलकर 
तुम्हारी खैर-ओ-खबर पूछ लूं 

अगर तेरे बचपन की तरह वो, मेरा भी घर होता 
तो मुझ पर घर न आने की, कोई पाबन्दी नहीं होती 
                                              हेमलता